

🚨⚖️ सहारनपुर जिला एवं सत्र न्यायालय से बड़ी खबर: जरूरी कार्य से पहुंचे पत्रकार को पहचान पत्र दिखाने के बावजूद रोका गया, तैनात पुलिसकर्मी पर अभद्रता का आरोप — वरिष्ठ अधिकारी मौजूद, फिर भी क्यों दिखी सख्ती? ⚖️🚨
सहारनपुर के जिला एवं सत्र न्यायालय परिसर से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक व्यवस्था, पुलिस आचरण और नागरिक सम्मान को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारी के अनुसार एक पत्रकार अपने आवश्यक और निजी कार्य के सिलसिले में न्यायालय परिसर पहुंचे थे, जहाँ प्रवेश द्वार पर तैनात पुलिसकर्मियों ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। बताया जा रहा है कि पत्रकार ने नियमानुसार अपना वैध पहचान पत्र प्रस्तुत किया और स्पष्ट रूप से अपना उद्देश्य भी बताया, इसके बावजूद उन्हें परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार ड्यूटी पर तैनात एक पुलिसकर्मी ने बातचीत के दौरान कथित रूप से कठोर और असम्मानजनक भाषा का प्रयोग किया, जिससे स्थिति तनावपूर्ण हो गई। मौके पर मौजूद लोगों का कहना है कि पत्रकार ने पूरी शालीनता के साथ अपनी बात रखी, लेकिन संबंधित पुलिसकर्मी ने सख्त रवैया अपनाते हुए उन्हें बार-बार रोका और कथित अभद्र व्यवहार किया।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान एक वरिष्ठ तैनात पुलिस अधिकारी भी वहीं मौजूद थे, जिन्होंने बाद में हस्तक्षेप कर स्थिति को शांत करने का प्रयास किया और अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया, किंतु तब तक यह मामला चर्चा का विषय बन चुका था। अब बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि जब वरिष्ठ अधिकारी घटनास्थल पर मौजूद थे, तो अधीनस्थ कर्मी द्वारा ऐसा व्यवहार क्यों किया गया और समय रहते स्थिति को संतुलित क्यों नहीं किया गया। आरोपित पुलिसकर्मी का नाम आबिद खान बताया जा रहा है, जिन पर यह आरोप है कि उन्होंने अपनी ड्यूटी के दौरान आवश्यकता से अधिक सख्ती दिखाई। हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि न्यायालय परिसर की सुरक्षा को देखते हुए पुलिसकर्मी सतर्क रहते हैं, लेकिन यदि कोई व्यक्ति वैध पहचान पत्र के साथ अपने आवश्यक कार्य हेतु पहुंचता है तो उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार अपेक्षित होता है।
इस घटना ने न्यायालय परिसर में प्रवेश की प्रक्रिया, पहचान सत्यापन की व्यवस्था और पुलिस के व्यवहार संबंधी प्रशिक्षण पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। स्थानीय पत्रकारों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह मुद्दा केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक संवेदनशीलता और सार्वजनिक व्यवहार का विषय है। यदि कोई नागरिक, चाहे वह पत्रकार हो या आम व्यक्ति, वैध दस्तावेजों के साथ न्यायालय पहुंचता है तो उसके साथ गरिमापूर्ण संवाद होना चाहिए। दूसरी ओर कुछ लोग यह भी मानते हैं कि सुरक्षा व्यवस्था के तहत पुलिस को अपने अधिकारों का प्रयोग करने का अधिकार है, परंतु अधिकारों के साथ जिम्मेदारी और संयम भी आवश्यक है।
फिलहाल इस मामले को लेकर आधिकारिक स्तर पर कोई विस्तृत बयान सामने नहीं आया है, लेकिन चर्चा तेज हो गई है कि यदि आरोपों में सत्यता पाई जाती है तो संबंधित कर्मी के विरुद्ध विभागीय जांच हो सकती है। यह प्रकरण प्रशासनिक अनुशासन, पुलिस-जन संवाद और संस्थागत मर्यादा—तीनों के संतुलन की आवश्यकता को उजागर करता है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित विभाग इस पूरे मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश या संवेदनशीलता प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाएगा, ताकि न्यायालय जैसे महत्वपूर्ण संस्थान की गरिमा और नागरिकों का सम्मान दोनों सुरक्षित रह सकें।
संपादक – एलिक सिंह
वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़
ब्यूरो प्रमुख – हलचल इंडिया न्यूज़, सहारनपुर
ब्यूरो प्रमुख – दैनिक आशंका बुलेटिन, सहारनपुर
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